वैश्वीकरण का भारतीये
महिलाओं पर प्रभाव
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भारतीय समाज अन्य देशों के समाजों से कई गुणा अलग हैं। कई धर्म,
भाषा, संस्कृति,
रीति- रिवाज के सम्मिश्रण से बना ये समाज आज वैश्वीकरण के दौर
से गुजर रहा हैं। खासकर कर के भारतीय
महिलाओं में वैश्वीकरण का प्रभाव देखने को मिल रहा हैं। कल तक जो महिला घूंघट के पीछे रहती थी वो आज
कैसे घूंघट से निकल कर देश का प्रतिनिधित्व करती हैं?
मेडल तक ला रही हैं। वो खेल का या
सिनेमा का क्षेत्र हो या रहन- सहन का, हर तरफ वैश्वीकरण का दौर चल रहा है। महिलाएं
रोजगार के लिए बैटरी रिक्शा तक चला रही हैं। पिछले सदियों की बात करें तो परिणाम
कुछ औऱ होता था, लेकिन आज की बात करें तो परिणाम कुछ और भी हैं। जिसका जीता- जागता
परिणाम कुछ ही दिन पूर्व रियो ओलंपिक में देखने को मिला। जहॉ पर एक से बढ़कर एक
योद्धा ने अपना खेल का जौहर पेश किया, लेकिन भारतीय खिलाड़ियों के लिए परिणाम
अनुपात में ही रहा । जिमनास्ट में दीपा करमाकर ने चौथे स्थान प्राप्त कर ये सिद्ध
कर दिया कि भारत में तेजी से खेल का वैश्वीकरण हो रहा हैं। जो जिमनास्ट भारत का
खेल भी नहीं है, उसमें चौथा स्थान लाना खुद में महानता प्रदान कराता है। लेकिन
सवाल ये है कि.. क्या भारत में खेल के क्षेत्र में ही वैश्वीकरण हो रहा है?
जी नहीं! तो क्या?
पूर्व में भी भारत ने पी.टी. उषा जैसे महान धावक को दिया, वो क्या था?
भारत के 25 साल के इतिहास में पहली बार एक साथ चार महिलाओं को खेल
रत्न से समानित किया गया। इस सबके पीछे कहीं ना कहीं वैश्वीकरण तो हैं। इन सबको भुला दीजिए तो खास करके श्रम के क्षेत्र में महिलाओं का अकसर दोहन होता आ रहा है। भारत में समय दर समय वैश्वीकरण निम्न क्षेत्रों
में होता आ रहा है। भारत में शिक्षा एवं धार्मिक आधार पर महिलाएं देवी स्वरुप है,
लेकिन व्यावहारिक तौर पर भारतीय महिलाएं दोयम दर्जे पर है। भारतीय महिला केवल असमानता का ही शिकार नहीं है,
बल्कि समाजिक वंचनाओं का भी शिकार है। इनके साथ लैंगिक भेदभाव के अनेक कारण है।
जिसके कारण समाज में इनकी हैसियत अन्य के मुकाबले अलग है। वर्तमान में भारतीय
संस्कृति में हो रहे वैश्वीकरण से भारतीय महिलाएं अन्य विकसित देशों के मुकाबले
विश्व पटल पर अलग ही परिणाम पेश कर रही है, जो सरहानीय है। ये वैश्वीकरण शहर से
होते हुये गांव तक पहुंच चुका है। जिससे भारत को एक मजबूती मिला है। सरकार के
द्वारा समयनुसार महिलाओं के लिए अनेक योजना चलाया जाता रहा है। जिसके काऱण महिलाये
भी दफ्तर, हवाईसेवा,
रेलवे, शिक्षा इत्यादि क्षेत्र में अपना
योगदान दे रहीं है। सन 2000 ई0 के बाद भारत में महिलाएं के कौशल में खासा बदलाव
देखने को मिला है। आज महिलाएं सेना से लेकर प्रशासनिक सेवा तक में यागदान दे रहीं
हैं। एक से बढ़कर एक नाम विश्व के सामने खुलकर आ रहे हैं। कल तक भारत की महिलाओं
को खास करके खेतों में काम करने व बीज के संरक्षण में देखा जाता था अब वो महिलाएं
ग्लोबल कंपनी के साथ पुरुषों के मुकाबले अधिक के अनुपात में काम कर रही हैं। वर्ष
2005 में राष्ट्रीय महिला आयोग ने भूमंडलीकरण के कृषि पर होने वाले प्रभावों के
अध्यन में कहा था कि व्यापार संगठन के तहत कृषि पर समझौता अनुचित औऱ असमान है।
इससे कृषि में कार्यरत महिलाओं पर खासा बदलाव आया था । कॉरपोरेट अधारित कृषि ने
महिलाओं को उनके खाद उत्पादन, खाद प्रसंस्करण की जीविका में बेदखल करने का काम
किया है। यह सही है कि वैश्वी करण ने महिलाओं को एक नई दिशा दिया है। जिससे के
सहायता से महिलाएं रोजगार के क्षेत्र में श्रम कर रही हैं। जो महिलाएं परिवार की
देखभाल करती थी वो आज घर से बाहर आकर श्रम कर रही हैं। इससे घर ही नहीं बल्कि देश
को आर्थिक रुप से भी मजबूती मिला है। सन 1990 से शुरु हुए ठांचागत समायोजन यानि एस
ए पी कार्यक्रम के तहत कई विदेशी कंपनियों ने अपने निर्यात उद्योगों के क्षेत्र
में जैसे कपड़ा,खेल का समान,फूड प्रोसेंसिंग,खिलौनों के बनाने में सस्ता श्रम मानकर
महिलाओं को काम पर रखा। महिलाओं को गुलामों के जैसे पैसे मिलते थे..यानि श्रम
ज्यादा, पैसा कम । एक सर्वे के मुताबिक कुल काम के घंटो के मुकाबले महिलाएं से
अधिक काम कराया जाता था। जिससे स्त्रियों की गरीबी को बढ़ावा मिला। महिलाएं विश्व की दस तिहाई आय ही
आर्जित कर पाती है। ये आकड़ा दुखी करने वाला है।
भारत में केवल एक प्रतिशत महिला ही संपत्ति की मालिक है। ये आकड़ा कहीं - न
- कहीं चौंकाने वाला तो है लेकिन सत्य है। वैश्वीकरण का फायदा गांव के मुकाबले शहर
को हुआ है। लेकिन शहर से होते हुए ये गांवों में भी क्रांति ला दिया है। जिसका
श्रेय मीडिया को जाता है। 2000 में बींजिग प्लस 5 परिपत्र में 1995 में हुए
संयुक्त राष्ट्र महिला सम्मेलन के बाद से हुई प्रगति का आकलन करते हुए कहा गया था कि वैश्वीकरण महिलाओं को अवसर प्रदान कराता है। लेकिन फिलहाल
के परिणाम देश को आंनद देने वाला है। लेकिन सरकार को निम्न नियमों में बदलाव लाने की जरुरत है। मोदी सरकार ने
महिलाओं के लिए कई योजनाएं दी हैं, जो कि सराहनीय है। हकीक़त की बात करें
तो आज भारत की महिला निम्न कठिनाईयों के बावजूद देश का नाम रौशन कर रही है। पूर्व
के संस्कृति से उपर आकर जिंदगी जी रही हैं। सोशल साईट का इस्तेमाल कर रही हैं। आज
हम आपको एक ऐसे कवयित्री से मिलवा रहे हैं, जिन्होंने फेसबुक के माध्यम से कई
कविता को लिखकर एक मिशाल पेश की हैं। हम बात कर रहे है, बिहार की रहने वाली जयंती
कुमारी की जो साहित्य के क्षेत्र में योगदान दे रही हैं। अपने परिवार को देखरेख के
साथ- साथ निजी संस्थानों में जाकर बच्चों को साहित्य पढ़ाती है।
वैश्वीकरण का प्रभाव - दि्ल्ली के नागलोई में बैट्री रिक्शा चलाती महिला
रुपेश रंजन मिश्र’’बिहारी’’ के साथ जयंती कुमारी खास बातचीत के कुछ अंश ---
आपके मुताबिक शहर के मुकाबले गांव की महिलाएं रोजगार के
प्रति कितनी जागृत है?
जयंती कुमारी- देखिये, जब मैं गांव में रहती थी तब का माहौल कुछ और
था, लड़कियों को पढ़ाया नहीं जाता था, फिर रोजगार का सवाल ही नहीं उठता। परंतु आज
कल सरकार के सराहनीय प्रयासों से गांवों की लड़कियां भी पढ़ लिख कर आगे आ रही हैं,
और रोजगार के लिए प्रयत्नशील हैं।
आप भी बिहार के गांव से आती हैं, गांव के मुकाबले शहर महिलाओं के लिए
कैसा हैं? अक्सर शहरों में महिलाओं की सुरक्षा की
बात की जाती है, आप इन बातों को आप किस तरीके से लेती हैं?
जंयती कुमारी – महिलाएं यहां पर आजाद महसूस करती है। फालतू के रीति-
रिवाजों का कोई लेना – देना नहीं हैं। समाजिक कुरीतियों से दूर रहती हैं। जहां तक
सुरक्षा की बात है, तो गांवों के मुकाबले शहरों में महिलाएं रोजगार के कारण बाहर
ज्यादा निकलती हैं, इस वजह से यहॉ आपराधिक मानसिकता वाले लोगों को मौका ज्यादा
मिलता हैं। जिस वजह से महिलाएं ज्यादा असुरक्षित महसूस करती हैं।
आप समय- समय पर महिला की विकास के लिए कार्य करते आयीं
हैं, वैश्वीकरण का महिलाओं पर क्या प्रभाव देखती हैं?
जंयति कुमारी – हां मैं करती आयी हूं। मेरी अवधारणा हैं कि, समाज के
विकास में महिलाओं का योगदान अहम् है। जहॉ तक वैश्वीकरण की बात है तो वैश्वीकरण से
समाज में खासा बदलाव हुआ है। आज महिलाएं आई टी से लेकर हर क्षेत्र में बढ़ चढ़कर
हिस्सा ले रहीं है।
कवयित्री जयंती कुमारी की फाईल फोटो ..सौजन्य - फेसबुक


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